” जनक नंदिनी ” का मंचन 21 जनवरी को त्रिवेणी सभागार में
दिल्ली आजकल ब्यूरो, दिल्ली
17 January 2026
भारत के प्रसिद्ध रंगकर्मी और मैथिली एवं हिंदी के दिग्गज निर्देशक प्रकाश झा निर्देशित
‘ जनक नंदिनी ‘ मैथिली नाटक का मंचन 21 जनवरी को त्रिवेणी सभागार में होगा. इस नाटक की खासियत यह है कि इसमें सभी पात्र महिला हैं.
जनकनन्दिनी
(THE SOUND OF SICLENCE)
आलेख, परिकल्पना एवं निर्देशक : डॉ. प्रकाश झा
विशेष : मंच पर सभी पात्र स्त्रियाँ.
समूह : मैलोरंग (मैथिली लोक रंग) रेपर्टरी, दिल्ली
भाषा : मैथिली
अवधि : 75 मिनट
चयनित : 25वाँ भारत रंग महोत्सव – 2026; राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली ( 30 जनवरी, 2026)
चयनित : त्रिवेणी थिएटर फेस्टिवल – 2026, त्रिवेणी कला संगम, नई दिल्ली (21 जनवरी, 2026).
चयनित : रंग जलसा – 2024 (राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव), निर्माण कला मंच, पटना (19 सितम्बर, 2024).
प्रथम प्रस्तुति : सम्मुख सभागार, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली (।।।। ।।। ).

कथासार :
सर्वव्यापी सीता; जिन्हें वैदेही, मैथिली, भूमिजा, राघववल्लभा, जनकनंदिनी आदि नामों से सम्मानित किया गया है । सीता की कथा, उनकी कहानियाँ मिथिला के जन-जन में प्रचलित है । सुश्री सीता जन्म से लेकर विवाह तक मिथिला नगरी में रहती हैं । विवाहोपरांत मिथिला पुन: कभी नहीं लौटती, ना ही मिथिला ही अपनी बेटी को पुन: बुला पाता है । उपर्युक्त आलेख में सीता अपनी सखियों के बीच लौट आयी हैं । सखियाँ अपने बीच सहेली सीता को देख कर कभी भावुक होती हैं, तो कभी उस पर तंज भी कसती है । सुनी सुनाई वाद-अपवाद को सखी सीता से पूछ कर उसे सत्यापित करना चहती है । आज जनकलली भी अपनी सहेलियों के संग निर्भिक हो वो सब कुछ बोलतीं हैं, जिसे वह आज तक कहीं बोल नहीं सकी थी । अपने जीवन की खट्ठी-मीठी सभी परतों को खोलती चली जाती है, पर वह अभी भी अपने राघव से दूर नहीं होती है । वह अपने प्राणप्रिय राघव से नाराज है, …पर, अभी भी प्रेम की डोर से बंधी हुई है ।
‘जनकनन्दिनी’ नाट्य प्रस्तुति सीता के बहाने वर्तमान बेटियों की संयमित मौन गथा है । आज भी बेटियाँ जिस पुरुष से ब्याह दी जाती हैं, उनमें ही वह अपनी सम्पूर्णता देखने के लिए आतुर होती हैं । जैसे सीता स्वामी राम के प्रेम और विश्वास की डोर को अन्तिम साँस तक थामें रखी, वैसे ही आज भी माता-पिता के गृह से विच्छेदित होने के बाद अपने प्रियवर से मात्र स्नेह, साहचर्य और विश्वास चाहती है आज की बेटियाँ । अपने पति की स्नेहमयी शक्ति के बल पर वह तमाम असुविधाओं के साथ, दु:ख, भय, तनाव, असुरक्षा से पार पा लेती है । पर, पति का संदेह या अविश्वास या प्रताड़ना या अपमान उसे भी ‘जनकनन्दिनी’ की तरह ही आज भी तोड़ देती है । ऐसे समय में इन जनकनन्दिनियों का साथ आज भी समाज नहीं दे पा रहा है । न ही जनक रूपी पिता, न ही मैथिल रूपी परिजन, न ही कौशल्या रूपी सास, न ही लक्ष्मण रूपी देवर और न ही अयोध्या रूपी समाज – वह करे तो क्या करें ? स्थिति – परिस्थिति देखकर उसके ओठ सिल जाते हैं, आज भी । वह तब भी मौन रही और आज भी मौन ही है । सीता रूपी बेटियों की मौन ध्वनि का चित्कार है ‘जनकनन्दिनी’ ।
निर्देशकीय : ‘सीता’ विश्व के संवेदनशील समाज को रहस्यमय नारी चरित्र के रूप में आकर्षित करती रही है । मिथिला के लोगों के लिए तो वह उनकी बहन है, बेटी है । उनके अनुजों के मन में हजारों प्रश्न घर कर बैठा है, जिसे वह अपनी बहन से पूछना चाहता है । यही प्रश्न एक बहन के प्रति भाई का प्रेम है, गुस्सा है । जो मुझ में भी है, जिसे ‘जनकनन्दिनी’ के रूप में व्यक्त करने की कोशिश किया है । जनकनन्दिनी के बहाने ही अपने समाज से भी मुखातिब होने का मौका प्राप्त हुआ है ।
जनकनन्दिनी के अंतरमन की व्यथा स्वयं जनकनन्दिनी ही कहे तो अधिक प्रभावी होगा । अत: मंच पर पाँचों जनकनन्दिनी (महिला) ही रहे ऐसा ही सोचा गया । अपनी कथा किसी और के बहाने ही सही, जनकनन्दिनी सामने लाने में आनन्द की अनुभूति तो होती ही है । सभी रंगकर्मियों ने दिल से इसे स्वीकार किया । अभिनय पक्ष में आत्मीयता और भंगिमा को शास्त्रीय एवं आधुनिकता के मध्य रखने की कोशिश की गई है । परिधान मिथिला से जुड़ा हुआ एवं रंगकर्मियों की भंगिमा में बाधक ना बने, इसी सोच से उपयोग किया गया है । संगीत को पूर्णत: स्थानीय और सर्व विदित होने से सर्वसाधारण के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बनाने का प्रयास किया गया है । सबसे महत्वपूर्ण पक्ष प्रकाश व्यवस्था है, जिसे तीक्ष्ण होने से बचा गया है । प्रकाश व्यवस्था से मनमोहक दृश्य के रूप में सम्पूर्ण नाटक को परिकल्पित किया गया है । मंच सज्जा एकदम साधारण जैसे किसी फुलबाड़ी का मचान मात्र रखा गया है ।
आप देखेंगे, अच्छा लगेगा – कई प्रश्न आपके मन में उभरेंगे, कई भ्रांतियाँ खुलेंगी । जनकनंदिनियों के प्रति आपकी दृष्ठि से बदलाव अवश्य आएगा ऐसा विश्वास है और किसी नाटक नाट्य मंचन की उपलब्धि भी यही होती है ।
निर्देशक : प्रकाश झा
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मैथिली भाषा एवं संस्कृति को विस्तारित – स्थापित करने में सर्वोपरि भूमिका निभानेवाले सुपरिचित रंगकर्मी एवं शोधार्थी डॉ. प्रकाश झा दिल्ली सरकार के कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग द्वारा ‘बिहार सम्मान’ (2015) से कई सम्मान से सम्मानित हैं । आप वर्ष 1994 से ही सक्रिय रंगकर्म से जुड़े हुए हैं । आपका रंगकर्म मुख्यरूप से भाषायी एवं भारतीय रंगमंच के बीच सेतु का काम करती है । ‘मैलोरंग रेपर्टरी’ एवं ‘प्रकाशन’ के संस्थापक निदेशक हैं ।
नाट्यकला में पी. एच – डी. एवं संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार से जूनियर (2004) तथा सीनीयर रिसर्च फ़ेलोशिप (2016) प्राप्त हैं तथा डी. लिट्. के लिए अध्ययरत हैं । कई पुस्तकें प्रकाशित हैं । आपके द्वारा लिखित नाटक ‘विभाजन की विभीषिका’ को संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा देश के सभी मानय्ता प्राप्त भाषाओं में अनूदित कर मंचित कराया गया है ।
तीस से अधिक नाटकों का निर्देशन एवं पचास से अधिक नाटकों में अभिनय आपके रंगमंचीय सक्रियता को विस्तृत फलक प्रदान करता है । आपके द्वारा निर्देशित नाटक ‘भारत रंग महोत्सव’ (इण्टरनेशनल थिएटर फेस्टीवल) में भी मंचित हो चुका है । नाटक गोरक्ष-विजय, मणिमंजरी, सुन्दर-संयोग जैसी ऎतिहासिक मैथिली नाट्यकृति के प्रथम मंचन का श्रेय भी आपको ही जाता है । सुप्रसिद्ध रंग संस्था संभव, दिल्ली के साथ बतौर अभिनेता आप सक्रिय हैं ।
राष्ट्रीय स्तर पर कई महोत्सवों, संगोष्ठियों आदि के परिकल्पक रहे डॉ. प्रकाश झा वर्तमान में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली में प्रकाशन प्रभारी तथा सहायक जन-संपर्क अधिकारी के रूप में योगदान दे रहे हैं ।
समूह : मैलोरंग रेपर्टरी, दिल्ली:
मैथिली लोक रंग यानी मैलोरंग रेपर्टरी, दिल्ली की स्थापना सन् 2006 में हुई । मूल उद्येश्य अमूर्त सांस्कृतिक विरासत एवं विविध सांस्कृतिक परम्पराओं, मिथिला चित्रकला, नाट्यकला एवं इन विधाओं से जुड़े शिल्पियों आदि के अनुशंधान, संरक्षण, संवर्धन, प्रशिक्षण, प्रसारण तथा उनका प्रलेखण है । इन उपक्रमों को आधुनिकता के अंधानुकरण से सुरक्षित रखकर विश्व फलक पर इसके उपस्थिति को अंकित करने के लिए प्रतिबद्ध प्रतिष्ठाण है ‘मैलोरंग’ । मैलोरंग विगत वर्षों में भारत के विभिन्न शहरों एवं महत्वपूर्ण महोत्सवों में अपनी गरिमामयी उपस्थिति तो दर्ज किया ही है, साथ ही पड़ोसी देश नेपाल में भी समय समय पर भागीदारी दिया है । वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ. प्रकाश झा के मार्गदर्शन में मैलोरंग अपनी कार्य पद्धति एवं सक्रियता से कुछ ही वर्षों में राष्ट्रीय छवि स्थापित कर चुका है । मैलोरंग रेपर्टरी के नाटक देश विदेश के कई महत्वपूर्ण महोत्सवों में प्रदर्शित होकर ख्याति हाशिल किया है । इसके कुछ प्रमुख नाटकों में काठक लोक, एक छल राजा, कमलमुखी कनिया, कोसी सन बेदर्दी जग मे कोई नै, जल डमरू बाजे, पाँच पत्र, विलाप, मुक्ति पर्व, सुन्दर संयोग, बड़ा नटकिया कौन, पैघ नटकिया के ?, मणिमञ्जरी, भ्रष्टाचार या सदाचार, ओरिजनल काम, देह पर कोठी खसा दीअ’, रोमियो – जूलिएट / चान चकोर, मैथिल नारी : चार रंग, अमली, आब मानि जाउ, एकादशी, डोमकछ, ललका पाग, जट-जटिन, धूर्त्तसमागम, चैनपुर की दास्तान, गोरक्षविजय, मिनाक्षी, बाबा यात्री, बिजहो, जनकनंदिनी, बड्ड मुश्किल छै आदि है ।
पात्र परिचय:
जनकनंदिनी एवं सखी एक : सुश्री ज्योति झा
जनकनंदिनी एवं सखी द: सुश्री दीक्षा झा
जनकनंदिनी एवं सखी तीn – सुश्री सुरभि झा
जनकनंदिनी एवं सखी चारि:सुश्री साक्षी झा
जनकनंदिनी एवं सखी पाँच:सुश्री सुरभि सिंह
जनकनंदिनी एवं सखी छ::सुश्री पायल धिरासारिया
मंच पार्श्व :
संगीत परिकल्पना
:
अजय कुमार (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय स्नातक)
गायन स्वर
:
ज्योति झा, अनुराधा कुमारी एवं बबीता प्रतिहस्त
सहयोग
:
रमेश मल्लिक, शोभा झा, आराधना एवं रौशनी कुमारी
सारंगी
:
अनिल कुमार मिश्रा
ध्वनि प्रभाव
:
संतोष कुमार सैंडी
पार्श्व ध्वनि
:
सुष्मिता झा
संगीत संचालन
:
हर्ष कुमार मनु
वस्त्र विन्यास
:
सम्मिलित रूप से
इलेक्ट्रॉनिक मैपिंग
:
आलोक कुमार शुक्ल ‘तुमुल’
प्रकाश परिकल्पना
:
रमण कुमार
मंच परिकल्पना
:
रमण कुमार
मुख्य सज्जा
:
सम्मिलित रूप से
प्रस्तुति प्रबंधन
:
नीतीश कुमार झा
आलेख एवं निर्देशन
:
डॉ. प्रकाश झा
आभार : सुश्री नूपुर, सुश्री मजूषा झा, श्री राजीव मिश्रा, सुश्री महिमा अग्रवाल, श्री संजीव ‘बिट्टू’ ।
आलेख सहयोग हेतु विशेष आभार : डॉ. शांति यादव, डॉ. आभा झा, श्री आसिफ़ अली हैदर खान, स्व. आगा हश्र काश्मीरी एवं स्व. रवींद्र ठाकुर ।